Sunday, 16 December 2018

भारत के बड़े नोट नेपाल में अवैध: इंडो-नेपाल मित्रता खतरे में

2016 में हुए विमुद्रीकरण के कारण भारत के विदेशी संबंध पहले ही खराब होते दिखायी दिए थे। नोटबंदी से रातों रात 500 और 1000 के नोट अवैध कर दिए गए थे जिनको बैंक में जमा करने का समय दिया गया था। भारत के अतिरिक्त भारतीय मुद्रा नेपाल, भूटान तथा ज़िम्बाब्वे जैसे कई अन्य देशों में भी थी जो बैंकों में जमा नही हो पायी।


नेपाल में सबसे अधिक भारतीय मुद्रा थी क्योंकि वहाँ सीधे-सीधे मुद्रा का प्रयोग किया जाता था। नोटबंदी से बड़ी मात्रा में 1000 तथा 500 के नोट नेपाल में फँसे रह गए थे जिसको बदलने की माँग की गई थी पर भारतीय सरकार ने कहा कि जितना समय भारतीयों को मुद्रा बैंकों में जमा करने हेतू मिला था उसी समय सबको कराना था। इस वजह से वहाँ भारतीय मुद्रा फँसने से लोगों को भारी नुकसान उठाना पड़ा।
इस सबके बावजूद नेपाल तथा भारत के व्यापारी नई भारतीय मुद्रा में व्यापार कर ही रहे थे कि नेपाल सरकार ने भरतीय मुद्रा के 200, 500 तथा 2000 के नोटों को अवैध घोषित कर दिया। सूचना मंत्री गोकुल बसकोटा ने 13 दिसंबर वीरवार को औपचारिक तौर पर इसकी घोषणा की। इस फैसले को भले ही नेपाल सरकार ने नेपाल के लिए सोचा हो कि अगर कल फिर नोटबंदी जैसे फैसले भारत लेता है तो नेपाल उससे प्रभावित न हो। पर वहीं व्यापारियों का वो तबका जो 2016 की नोटबंदी के भयावह फैसले से बबड़ी मुश्किल से उभर पाया था तथा फिर से आम व्यापार करने लगा था वह अब फिर से परेसानी में है। इस फैसले से भारत मे काम कर रहे नेपाली लोग जो साल अथवा 2-3 साल में अपने घर पैसा जोड़कर ले जाते थे उनके समक्ष भी एक बड़ा संकट आ गया है।
आर्थिक संकट के अतिरिक्त इसे भारत-नेपाल के संबंध में आयी दरार के रूप में भी देखा जा रहा है। भारत- नेपाल की मित्रता दशकों से चली आ रही है। भारत के लोग नेपाल तथा नेपाल के लोग भारत बिना किसी कागज़ी कार्यवाही के यात्रा अथवा कार्य कर सकते हैं। भारत मे लोक सेवा की परीक्षा में नेपाल तथा भूटान के लोगों को भी बैठने की अनुमति है। ऐसी स्थिति में मुद्रा को अवैध करना दोनो देशों की मित्रता पर एक प्रश्न चिह्न लगा देता है।

Monday, 6 August 2018

सोशलिस्ट युवजन सभा के राष्ट्रिय अध्यक्ष नीरज कुमार से विशाल जोशी और प्रदीप साह की बातचीत

प्रश्न : आप सोशलिस्ट युवजन सभा के अध्यक्ष हैं | समाजवाद में आपकी गहरी रुची हैं | अगस्त क्रांति (भारत छोड़ो आन्दोलन) में समाजवादियों कि क्या भूमिका रही हैं ?
उत्तर : इस क्रांति का मूलमंत्र महात्मा गांधी ने दिया था - 'करो या मरो' | उसमें आचार्य नरेन्द्र देव का सहयोग उन्हें मिला था क्योंकि प्रस्ताव तैयार करते समय वे भी वर्धा में थे | लोहिया 9th अगस्त को ही भूमिगत हो गए थे और अपनी गिरफ़्तारी तक आन्दोलन चलाते रहे | जयप्रकाश नारायण जान हथेली पर रखकर हजारीबाग जेल से फरार हुए और अगस्त क्रांति के हीरो बने 1942 का आन्दोलन आज़ादी के आन्दोलन में और सोशलिस्ट आन्दोलन में एक उच्चतम बिंदु था | उसमें नौजवान और खासकर सोशलिस्ट उभर कर आए और अपना पूरा दायित्व निभाया | इस आन्दोलन के जो महत्वपूर्ण नेता थे, वे सोशलिस्ट ही थे, वे चाहें अचुत्य पटवर्धन हों, डॉ. लोहिया हों, युसूफ मेहर अली हों, अरुणा आसफ अली हों या जयप्रकाश नारायण हों | 
प्रश्न : सोशलिस्ट पार्टी और उसकी युवा इकाई सोशलिस्ट युवजन सभा अगस्त क्रांति दिवस पर हर साल आन्दोलन करती हैं इसका क्या कारण हैं ?
उत्तर : राष्ट्रिय आन्दोलन और खासकर उसके अंतिम संघर्ष के मूल्यों, आदर्शों तथा मान्यताओं को अगर प्रसारित नहीं तो कम-से-कम बचाए रखने कि जिम्मेदारी समाजवादियों पर हैं | महात्मा गाँधी ने और उसके बाद भारत के समाजवादियों ने आजादी की लड़ाई को केवल अंग्रेजी हुकूमत के खात्में तक ही सीमित नहीं रखा था, बल्कि एक सुनहले समाज का सपना देखा था, उसका एक मोटा खाका खिंचा था, एक जीवन-दार्शन प्रस्तुत करने की कोशिश की थी | सबका आधार था - आत्मनिर्भरता और सादगी | उनके कल्पना में निहित था कि भारत के नागरिक ज्ञान-विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी का विकास अतृप्त एवं असीमित इच्छाओं को संतुष्ट करने और उन्हें बढाने के दुश्चक्र में फंसने के लिए नहीं बल्कि उन्हें तृप्त तथा सीमित करने के लिए करेंगे | स्वाभाविक तौर पर वह व्यवस्था विकेन्द्रित होती, प्रत्येक नागरिक की आवश्यक जरूरतें पूरी होती और नागरिकों के बीच जीवन स्तर का अंतर न्यूनतम होता | वैसी व्यवस्था में एक ऐसे मनुष्य का सृजन होता जो केवल अपनी इकाई के हित को ही सर्वोपरि नहीं मानता बल्कि अपने को समाज का अभिन्न अंग मानकर सामाजिक दायित्व पूरा करने के लिए बराबर रुची लेता |
आजादी की इस अंतिम लड़ाई के 76वें साल में स्थिति ठीक उलटी है | गाँव की आत्मनिर्भरता के बदले भारतीय अर्थव्यवस्था को विश्व-अर्थव्यवस्था के साथ समायोजन के नाम पर फिर गुलाम बनाने का मुहीम छेड़ दिया गया है | पूरी नीति और कार्यक्रम अधिक-से-अधिक एक-चौथाई लोगों की सुख-सुविधा के लिए बनाए जा रहे हैं | विडम्बना यह हैं कि बाकी तीन-चौथाई लोग उन सुख-सुविधाओं की मृग-मरीचिका के पीछे पागल होकर दौड़ रहे हैं | परिणामतः पूरा समाज मानसिक तौर पर इस आपा-धापी में लगा है और जाने-अनजाने इस व्यवस्था को मजबूत कर रहा है | जो व्यक्ति या समूह इसकी असलियत समझते भी हैं, उनमें या तो निराशा घर कर रही है, या इतने बिखरे हैं कि कोई कारगर कदम नहीं उठा पा रहे हैं | ऐसी स्थिति में सोशलिस्ट पार्टी और सोशलिस्ट युवजन सभा का दायित्व बनता हैं कि आज़ादी के मूल्यों विचारों के माध्यम से आज के समस्या को जनता के सामने लायें यही काम हम लोग कर रहे हैं |
प्रश्न : वर्त्तमान शिक्षा व्यवस्था पर आप क्या कहना चाहेंगे ?
उत्तर : सोशलिस्ट युवजन सभा मानती है कि उच्च शिक्षा के बाजारिकरण की नींव सन 1999 में भारत सरकार ने यूनेस्को को पेश अपने पर्चे में डाल दी थी इस पर्चे में तत्कालीन मानव संसाधन मंत्री ने दावा किया था कि उच्च शिक्षा सार्वजनिक हित के लिए नहीं हैवरन यह महज  व्यक्तिगत हित का'बिकाऊ मालहैइसलिए इसकी किमत छात्रों को व्यक्तिगत तौर पर ही चुकानी चाहिएन कि सरकार को |आगेसन 2000 में प्रधानमंत्री की'आर्थिक मामलों की परिसदको पेश अम्बानी-बिड़ला रपट ने कहा कि सरकार को उच्च शिक्षा को पैसा देना बंद करके इसे पूरी तरह बाज़ार के हवाले कर देना चाहिए और बाज़ार तय करेगा कि क्या पढाया जाएकैसे पढाया जाए यानी ज्ञान पर बाज़ार का पूरा कब्जा हो जाएगा इस क्रम को आगे बढाते हुए भारत सरकार ने अगस्त 2005 में विश्व व्यापार संगठन के पटल पर उच्च शिक्षा का अपना'संसोधित प्रस्तावरख दिया यानी उच्च शिक्षा के दरवाजे बाज़ार के लिए खोलने की पेशकश कर दी हम चाहते हैं कि केंद्र सरकार से उच्च शिक्षा से सम्बंधित विश्व व्यापार संगठन के प्रस्ताव से  हट जाए, नहीं तो सरकार को ही हट जाना चाहिए | क्योंकि केंद्र में इसके बने रहने का अर्थ होगा भारत की उच्च शिक्षा को उन विदेशी कॉर्पोरेट घरानों को बेच वैश्विक पूंजी के निर्देशन और हित में कार्य कर रहे हैं और भारत के युवाओं के हितों के विरुद्ध हैं, जिसका दुष्परिणाम राष्ट्र की संप्रभुता के लिए चुनौती पैदा होना तथा छात्रों को उच्च शिक्षा से वंचित करना होगा |निजिकरण एवं बजारिकरण से शिक्षा न केवल गरिबों और पहले से जाति,धर्मलिंग व विकलांगता के कारण वंचित तबकों के हाथ से निकल जाएगीबल्कि जो इसका खर्चा उठा सकते हैं उन्हें भी केवल ना मात्र की शिक्षा ही मिलेगी ऐसा इसलिए होगा क्योंकि बेतहाशा बाजारिकरण के चलते शिक्षा अपने मूल उद्देश्य से भटक जाएगी और साथ ही पाठ्यक्रमविषयवस्तु व शिक्षणपद्धति में भी भारी गिरावट होगीशिक्षा इतनी महँगी हो जाएगी कि मध्यम वर्ग के लिए भी इसका बोझ ढोना मुश्किल हो जाएगा | WTO के मातहत शिक्षा में लोकतांत्रिक व सामाजिक न्याय के एजेंडे को दरकिनार कर दिया जाएगा और इसके अन्तर्गत अब तक किए गए प्रावधानो को जैसे कि आरक्षण,होस्टलस्कलरशिपफ़ीस में छूट या मुफ़्त शिक्षा आदिके लिए भी कोई जगह नहीं बचेगी|
राजग के नेतृत्व में मौजूदा केंद्र सरकार नई शिक्षा नीति को लागू कर रही है, जिसकी बुनियाद में कॉर्पोरेटीकरण, केन्द्रीयकरण और फिरकापरस्ती लाना हैं | शिक्षा संस्थानों के प्रबंधन और माली स्त्रोतों को बदला जा रहा है, ताकि शिक्षा को मुनाफे का व्यवसायिक धंधा बनाया जा सके | जोर-शोर से पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) मॉडल को बढाया जा रहा है; सरकारी खर्च से चलने वाले स्कूल बंद किए जा रहे हैं, उन्हें एक दुसरे में जोड़कर उनकी संख्या कम की जा रही हैं | स्कूली और उच्च-शिक्षा दोनों के लिए बजट में आबंटन में बुरी तरह कटौती की जा रही है और फीस कई गुना बढ़ा दी जा रही है | अपने खर्च से पढ़ाई वाले कोर्स जबरन लागू किए जा रहे हैं | शिक्षा संस्थानों में लोकतान्त्रिक विमर्श की जगह कम हो रही है |
सोशलिस्ट पार्टी का मानना हैं कि शिक्षा ऐसी हो जो आवाम को पूरी तरह मुफ्त और बिना किसी भी तरह के भेदभाव के मिल सके -चाहे वह वर्ग, पितृसत्ता, मजहब, जुबान, अंचल, विकलांगता या और किसी भी तरह का ऐतिहासिक भेदभाव क्यों न हो और जो मौजूदा समाज को बदलकर लोकतान्त्रिक, धर्मनिरपेक्ष, बराबरी पर आधारित, न्यायपूर्ण, प्रबुद्ध और मानवीय बना सके | हमारी यह लड़ाई सरकारी खर्च से चलने वाली सार्वजनिक शिक्षा में कटौती, मुनाफाखोरी, निजीकरण और व्यापार बन चुकी शिक्षा व्यवस्था के खिलाफ हैं |
प्रश्न : सोशलिस्ट पार्टी जो 9th अगस्त को आन्दोलन कर रही हैं 'शिक्षा और रोजगार दो वर्ना गद्दी छोड़ दो' में शिक्षा के साथ-साथ रोजगार को भी रखा हैं | बेरोजगारी कि समस्या बढती जा रही हैं इसपर आप क्या कहेंगे |
उत्तर : देखिये नवउदारवादी 'सुधारों' ने भारतीय समाज में वैश्विक पूंजी को बेलगाम अधिकाधिक घुसपैठ करने दिया, जिससे संवैधानिक सिद्धांत और मूल्य औंधे मुंह गिर पड़े और सामाजिक इन्साफ के सरोकारों को धीरे-धीरे छोड़ दिया गया और निरंतर डिजिटल टेक्नोलॉजी के बलबूते 'रोजगार-विहीन आर्थिक बढ़त' के वैश्वीकरण के महामंत्र ने शासक वर्गों की जमात को मंत्रमुग्ध कर दिया और गुलाम बना डाला | जिसका नतीजा आज के युवाओं को बेरोजगारी के रूप में देखने को मिलता हैं |
आईएलओ के अनुसार वर्ष 2018 में भारत में बेरोजगारों की संख्या 1.86 करोड़ रहने का अनुमान हैं | साथ ही इस संख्या के अगले साल 2019 में 1.89 करोड़ तक बढ़ जाने का अनुमान लगाया गया है | आंकड़ो के अनुसार, भारत दुनिया के सबसे ज्यादा बेरोजगारों का देश बनता जा रहा हैं | इस समय देश की 11 प्रतिशत आबादी बेरोजगार हैं | ये वे लोग हैं जो काम करने लायक हैं, लेकिन उनके पास रोजगार नहीं हैं | बीते तीन से चार साल में बेरोजगारी की दर में जबरदस्त इजाफा हुआ है | मोदी सरकार के श्रम मंत्रालय के श्रम ब्यूरो के सर्वे से भी सामने आया है कि बेरोजगारी दर पिछले पांच साल के उच्च स्तर पर पहुँच गई है |
सरकारी क्षेत्र में रोजगार हासिल करने के लिए बेरोजगार युवाओं को आज कितनी मशक्कत करनी पड़ रही हैं, यह किसी से छिपी नहीं है | पढ़े-लिखे लोगों में  बेरोजगारी के हालात ये हैं कि चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी के पद के लिए प्रबंधन की पढ़ाई करने वाले और इंजीनियरिंग के डिग्रीधारी भी आवेदन करते हैं | देश में बेरोजगारी की दर कम किए बिना विकास का दावा करना कभी भी न्याय सांगत नहीं कहा जा सकता | इसलिए हम कहते हैं कि 'हर हाथ को काम दो वर्ना गद्दी छोड़ दो' |
प्रश्न : अंत में आप क्या कहना चाहेंगे ?
उत्तर : जिस आर्थिक नीति पर आज वाक्-युद्ध छिड़ा हुआ हैं, उसको पुष्ट करने में आज के प्रत्येक दल ने योगदान दिया है | जिस उदार नीति, बहुराष्ट्रीय कंपनियों को निमंत्रण पर कागजी शेर दहाड़ रहे हैं, वह रातों-रात तो आ नहीं टपकी | कुछ तो हमें साम्राज्यवाद से विरासत में मिली, कुछ को विशेष प्रौद्योगिकी के चयन के कारण बहुत पहले न्योतना पड़ा और अस्सी-नब्बे के दशक में हमनें निर्यात तथा विकास दर बढाने के नाम पर यह काम शुरू कर दिया | आज जो विपक्षी दलों के बड़े-बड़े नेता हैं, वे भी इसमें भागीदार रहे हैं | आर्थिक सोच में असामना रहते हुए भी भाजपा अपना अस्तित्व बनाए रखने में कामयाब हुआ हैं क्योंकि उसका आधार सांप्रदायिक टकराव से पुख्ता होता हैं | जब उसकी आर्थिक नीतियों के फलस्वरूप अधिसंख्य लोगों का मोहभंग होगा तभी उसका ह्रास होगा | आज की स्थिति में गांधी, लोहिया, जयप्रकाश तथा आचार्य नरेंद्र देव की परंपरा और राष्ट्रीय आन्दोलन के मूल्यों को आगे बढाए बिना लड़ाई मजबूत नहीं हो सकती | इसलिए मेरा निवेदन हैं कि सोशलिस्ट पार्टी जो 9th अगस्त को आन्दोलन कर रही हैं 'शिक्षा और रोजगार दो वर्ना गद्दी छोड़ दो' का हिस्सा बनिए | यह आपकी आवाज हैं और सभी हाथ मिलेंगे तभी आजादी के मूल्यों को मजबूती मिलेगी |

Friday, 3 August 2018

कवि दिवस : 3 अगस्त

 आज के दिन यानी 3 अगस्त को हिंदी सहित्य जगत में 'कवि दिवस' के रुप में मनाया जाता है। किंतु 3 अगस्त को ही कवि दिवस में मनाने का कारण क्या हैं ? तो इसका कारण यह है कि आज ही के दिन 3 अगस्त 1886 में साहित्य जगत के प्रसिद्ध कवि मैथिलीशरण गुप्त का जन्म हुआ था । इनका जन्म स्थल चिरगाँव , उत्तर प्रदेश हैं और वहीं से उन्होंने प्राथमिक शिक्षा प्राप्त की थी। हिन्दी साहित्य के इतिहास में वे खड़ी बोली के प्रथम महत्वपूर्ण कवि है। उन्होंने हिन्दी , बंगला , संस्कृत तीनों भाषाओं के साहित्य का अध्ययन कर ज्ञान प्राप्त किया है, और उन्होंने इन भाषाओं में कई रचनाएँ भी की हैं । गुप्त जी के काव्य में राष्ट्रीयता और गांधीवाद की प्रधानता है।उनकी कृति भारत - भारती जो 1912 में स्वतंत्रता संग्राम के समय प्रकाशित हुई थी और इसीलिए महात्मा गांधी ने गुप्त जी को 'राष्ट्रकवि'  की उपाधि से नवाज़ा था।
  भारत भारती में देश की वर्तमान दुर्दशा पर क्षोभ प्रकट करते हुए उन्होंने देश के अतीत का अत्यंत गौरव और श्रध्दा के साथ गुणगान किया है।
 जो कि स्वतंत्रता सैनानियों के भीतर नई ऊर्जा प्रवाहित करने के कार्य में सफल रहा । गुप्त जी ने प्रबन्ध काव्य तथा मुक्तक काव्य दोनों में रचनाएँ की है। उनके द्वारा की गई रचनाएँ साहित्य जगत के लिए अनमोल है , जिसके सम्मान में उनकी जयंती के दिन को "कवि दिवस" के रुप में मनाया जाता है।



                                अंजली चौहान

Thursday, 2 August 2018

असम में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर : जिम्मेदारी, सावधानी और संयम की जरूरत

असम में अवैध रूप से रहने वाले बंग्लादेशी नागरिकों की मौजूदगी की समस्या काफी जटिल और पुरानी है. असम में बांग्लादेशी घुसपैठ के विरुद्ध अस्सी के दशक में जब वहां के छात्रों ने आंदोलन किया था तो उनका समर्थन पूरे देश के समाजवादियों और गांधीवादियों ने किया था। तब वह आंदोलन धर्मनिरपेक्ष था और उसका जोर असमिया नागरिकों की अस्मिता बचाने पर था। हालांकि उसमें बांग्लाभाषियों का विरोध था, लेकिन आंदोलन में असमिया समाज के सभी तबके के लोगों ने हिस्सा लिया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उसे सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश की और जब वे ब्रह्मपुत्र घाटी में एक रैली में गईं तो वहां नारा भी लगा था कि 'हाथ में बीड़ी मुहं में पान असम बनेगा पाकिस्तान'। वह सब कांग्रेस का वोट बैंक था. बांग्लादेश से लगी सीमा पर ढीली-ढाली सुरक्षा व्यवस्था होने के कारण घुसपैठ जारी रही। इस बीच नेल्ली नरसंहार ने उस आंदोलन का सांप्रदायिक और वीभत्स रूप भी उजागर किया। उस नरसंहार में अल्पसंख्यक समुदाय के औरतों-बच्चों को काट डाला गया था। उनके बाद प्रधानमंत्री बने राजीव गांधी ने 1985 में असम समझौता किया. असम में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर की परिकल्पना उसी प्रक्रिया का परिणाम है. इसके मुताबिक जिनके नाम राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर में नहीं दर्ज होंगे, उन्हें भारत का नागरिक नहीं माना जायेगा. इसमें विदेशी नागरिकों की पहचान करके उन्हें बाहर करने का निर्णय लिया गया। लेकिन राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव और बांग्लादेश से इस तरह का कोई समझौता न होने के कारण वह काम हो नहीं पाया।



मौजूदा सरकार ने सोमवार को जो राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर जारी किया है, उसमें 40 लाख से ऊपर लोगों के नाम नहीं हैं. उनके परिवारों को जोड़ा जाए तो यह संख्या एक करोड़ से ज्यादा होगी. ऐसा बताया जा रहा है कि राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर से बाहर किये गए 40 लाख लोगों में से ज्यादातर भारतीय नागरिक हैं. इनमें हिंदू और मुसलमान दोनों शामिल हैं. एक राज्य में इतनी बड़ी संख्या में लोगों को असुरक्षा की स्थिति में डाल देना बताता है कि राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर तैयार करने में कर्तव्य का सही तरह से निर्वाह नहीं किया गया है. ऐसा लगता है कि सरकार को समस्या के समुचित समाधान के बजाय चुनावी फायदे के लिए राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर जारी करने की जल्दी थी. इस आवश्यक कार्य को गैर-राजनीतिक तरीके से किया जाना चाहिए था. लेकिन भाजपा नेतृत्व ने वैसी परिपक्वता का प्रमाण नहीं दिया.



भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के अध्यक्ष अमित शाह राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर के प्रकाशन को पराक्रम की तरह पेश कर रहे हैं. पश्चिम बंगाल के भाजपा प्रभारी कैलाश विजयबर्गीय असम के बाद पस्श्चिम बंगाल पर धावा बोलने की शैली में बयान दे रहे हैं. अमित शाह ने पूरे मसले को राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़ने की बेजा बयानबाजी संसद में की है. भाजपा नेताओं की इस तरह की गैर-जिम्मेदाराना बयानबाज़ी से इस मुद्दे पर गृहमंत्री राजनाथ सिंह द्वारा दिया गया शुरूआती संतुलित बयान निरर्थक हो गया है. सत्तारूढ़ पार्टी और उसके अध्यक्ष को समझना चाहिए कि  राष्ट्रीय सुरक्षा पर खतरा असम में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर के नाम पर पूरे देश में साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण करने की उनकी मंशा से है. दरअसल, देश की इस पुरानी और जटिल समस्या पर भाजपा की निगाह लंबे समय से थी. केंद्र और राज्य में सत्ता में बैठने के बाद उसने रजिस्ट्रार जनरल आफ इंडिया और जनगणना आयुक्त के कार्यालय का इस्तेमाल कर उसे ऐसा रूप दिया है कि उस पर लंबे समय तक साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति की जा सके. साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के रास्ते पर भाजपा का तात्कालिक लक्ष्य 2019 के लोकसभा चुनाव हैं. हिंदी क्षेत्र में विपक्षी दलों की एकजुटता से भाजपा मध्यावधि चुनाव हार चुकी है. उसकी भरपाई वह पूर्वोत्तर और पश्चिम बंगाल से करना चाहती है.



हालांकि सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में होने वाले नागरिकों के पहचान के इस कार्यक्रम में न्यायालय ने हस्तक्षेप करते हुए यह जरूर कहा है कि यह सूची अंतिम नहीं है बल्कि एक मसविदा है और इसके आधार पर कोई कार्रवाई नहीं होनी चाहिए। चुनाव आयोग ने भी कहा है कि राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर लोगों के मतदाता अधिकार को बाधित नहीं करेगा. लेकिन इस संवेदनशील मुद्दे पर जो राजनीति की जा रही है उसे न्यायालय कैसे रोक सकता है? जबकि सेनाध्यक्ष जनरल विपिन रावत भी राजनीतिक बयान देकर वहां हस्तक्षेप कर चुके हैं। यह सत्तारूढ़ पार्टी सहित सभी पार्टियों के नेतृत्व की जिम्मेदारी है. सोशलिस्ट पार्टी देश के राजनैतिक नेतृत्व से अपील करती है कि इस संवेदनशील मुद्दे पर वोट की राजनीति करने के बजाय मिल कर सुनिश्चित करें कि एक भी भारतीय नागरिक राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर से बाहर नहीं रहे. चाहे वह किसी भी प्रदेश का रहने वाला हो. राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर तैयार करते वक्त यह जिम्मा स्वयं नागरिकों का था कि वे साबित करें कि भारत के नागरिक हैं, जबकि संयुक्त राष्ट्र यह जिम्मेदारी राज्य पर भी डालता है। दूसरे, अवैध रूप से रहने वाले बंग्लादेशी नागरिकों, चाहे वे हिंदू हैं या मुस्लमान, पर भारतीय नागरिकता कानून और संयुक्त राष्ट्र (यूएनओ) के प्रावधानों की रोशनी में कार्रवाई करें.



सोशलिस्ट पार्टी का मानना है कि भारत को पूरा हक है कि वह अवैध तरीके से घुस आए लोगों की पहचान करे. अगर संभव है तो उन्हें उनके देश वापस भेजे, अगर नहीं संभव है तो उन्हें परमिट देने या नागरिकता देने पर विचार करे। इस बारे में नागरिकता संशोधन विधेयक 2014 में गैर-मुस्लिमों को नागरिकता देने की व्यवस्था तो है, लेकिन मुस्लिमों के लिए नहीं है। भारत संयुक्त राष्ट्र का सदस्य है. संयुक्त राष्ट्र का उद्देश्य 2024 तक दुनिया से नागरिकों की राज्यविहीनता समाप्त करना है। अगर इतनी बड़ी संख्या में लोगों को राज्यविहीन किया जाएगा तो इससे एक अंतरराष्ट्रीय समस्या पैदा होगी। 'विश्वगुरु' और 'वसुधैव कुटुंबकम' का दावा करने वाले भारत को इस समस्या पर सांप्रदायिक नजरिए से नहीं, संवेदनशील मानवीय नज़रिए से विचार करना चाहिए। इसमें सभी दलों की राय लेनी चाहिए, सुप्रीम कोर्ट को संविधान और संयुक्त राष्ट्र के चार्टर के अनुरूप निर्णय देना  चाहिए। 





डॉ. प्रेम सिंह
अध्यक्ष
सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया)

Tuesday, 31 July 2018

प्रेमचंद : एक दौर


    उर्दू और हिन्दी के महान भारतीय लेखक प्रेमचंद का जन्म आज के दिन 31 जुलाई 1880 में हुआ था इनका जन्म स्थल लमही ग्राम, वाराणसी , उत्तर प्रदेश में हुआ था। प्रेमचंद का हिन्दी साहित्य में जो योगदान हैं वह अतुल्यनीय हैं। उनके हिन्दी उपन्यास में दिए योगदान के कारण उन्हें उपन्यास सम्राट की उपाधि दी गई हैं। उन्होंने हिंदी में यथार्थवाद की शुरुआत की। प्रेमचंद ने सामाजिक विषयों पर रचनाएँ की जो सीधे समाज की व्यवस्था पर चोट करती है । वह विधवा - विवाह के समर्थक थे तथा उन्होंने अपना दूसरा विवाह अपनी प्रगातिशील परंपरा के अनुरूप बाल- विधवा शिवरानी देवी से किया । प्रेमचंद ने अपनी रचनाओं से हिंदी कहानी और उपन्यास की एक ऐसी परंपरा का विकास किया जिसनें पूरी सदी के साहित्य का मार्गदर्शन किया । वह संवेदनशील लेखक , कुशल वक्ता , विद्वान संपादक तथा सचेत नागरिक थे। उनकी सभी पुस्तकों के अंग्रेजी व उर्दू रुपांतरण तो हुए ही हैं , साथ  ही चीनी , रुसी आदि अनेक विदेशी भाषाओं में उनकी कहानियाँ लोकप्रिय हुई हैं। प्रेमचंद द्वारा रची गई कहानियाँ व उपन्यास अगामी पीढ़ी के लिए प्रेरणा श्रोत हैं।


                            अंजली चौहान

संसद मानसून सत्र 26 जुलाई 2018

   गृह मंत्री राजनाथ सिंह लोकसभा में भारतीय दंड संहिता , भारतीय साक्ष्य अधिनियम,1872, आपराधिक प्रक्रिया संहिता , 1973 में संशोधन और यौन अपराध अधिनियम से बच्चों का संरक्षण में संशोधन के लिए एक विधेयक आगे बढ़ाएगें ।
 केंद्रीय महिला एंव बाल विकास मंत्री मेनका गांधी के द्वारा लोकसभा में 26 जुलाई 2018 को एंटी तस्करी विधेयक पेश किया गया ,जो मानव तस्करी के पीड़ितों की रक्षा और पुनर्वास के समर्थन में हैं तथा अपराधियों पर मुकदमा चलाता हैं। यह विधेयक व्यक्तियों की तस्करी ( रोकथाम , संरक्षण व पुनर्वास) मामलों की जाँच के लिए एक राष्ट्रीय एंटी - ट्रैफिकिंग ब्यूरो की स्थापना के लिए प्रस्तुत किया गया है। मेनका गांधी द्वारा पूछा गया कि "मानव तस्करी एक सीमा तक कम अपराध है। विशेष अपराधों पर विशेष ध्यान देने की ज़रूरत है। जब हम महिलाओं और बच्चों को  माल की तरह बेचें जातें हैं तो हम चुप रह सकतें हैं? "आइए हम इस बिल को आज वास्तविकता के लिए लाखों पीड़ितों की रक्षा और प्रदान करने के लिए एक वास्तविकता बनातें हैं । हम सभी , विशेष रूप से सबसें कमज़ोर एक महिला और बच्चों को उत्तरदायी है। आज हमारें पास पहुँचने का मौका है उन्होंने उन कानूनों की गारंटी दी जो उनकें अधिकारों की गांरटी देतें हैं। उन्होंनें सदस्यों से बिल का समर्थन कर उसे पास काराने का आग्रह किया।
 बिल के समर्थन में नोबेल पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी दृढ़ता से खड़े हुए ।
 शाशि थरुर ने एंटी तस्करी बिल की 'कमियां ' बताई और इसलिए चर्चा के लिए एक संसदीय स्थायी समिति को संदर्भित किया जाना चाहिए।


                                 अंजली चौहान

Sunday, 29 July 2018

तनाव

जब परेशानी और तनाव
एक साथ होता है
तब आंखें नम नहीं होतीं, जलती हैं
उसी तरह जब
असंवेदनशीलता और हिंसात्मकता
एक साथ होती है
तब देश जलता है
सोचो!..

                       Saurabh mishra

Friday, 27 July 2018

राजधानी दिल्ली में 3 बच्चे भुखमरी के शिकार


 दिल्ली के पूर्व मे स्थित मंडावली इलाके की तीन नाबालिक लड़कियों की भुखमरी के कारण मौत होने का मामला सामने आया है। तीनों लडकियां बहने थी जो अपने माता-पिता के साथ रहती थी पिता रिक्शा चलाने का काम करता है तथा माँ मानसिक रूप से अस्थिर है । तीनों लडकियों के नाम शिखा(8 वर्ष), मानसी(4वर्ष), परुल(2 वर्ष) थे। कथित तौर पर भुखमरी और कुपोषण के कारण उनकी मृत्यु हो गई । बच्चों के पिता उतनी आमदनी नहीं एकत्र कर पाते थे कि पेट भर भोजन कर सकें क्योंकि पिता ड्रग का सेवन करता है जिसके कारण एक मात्र आय का प्राथमिक स्त्रोत भी परिवार ने खो दिया और उसका अपना रिक्शा भी चोरी हो गया जिसके कारण वह अपने मकान मालिक का रिक्शा चलाता था पर वह इससे अपने मकान का किराया नहीं चुका पाया और उसे घर खाली करके अपने दोस्त के घर मंडावली जाने को मजबूर होना पड़ा । पिता नौकरी की तलाश मे बाहर गया था कि पैसे इकट्ठा कर भोजन खरीद सके लेकिन दोपहर मे घर में तीनों लड़कियां एक के बाद एक बेहोश हो कर गिर गई तथा जब उन्हें पास ही के सरकारी अस्पताल लाल बहादुर शास्त्री अस्पताल ले जाया गया जहाँ डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। पुलिस ने मौत का कारण सुनिश्चित करने के लिए दो पोस्ट- मॉर्टम करवाए ताकि मौत को लेकर कोई भ्रम न हों। एलबीएस अस्पताल के द्वारा पोस्टमार्टम तैयार किया गया जिसमे बच्चों को अस्पताल ले जाने से 12-18 घंटे पहले उनकी मृत्यु की पुष्टि की गई।
इस तरह तीन बच्चियों की कुपोषण से मृत्यु होना बेहद दुखद हैं।
दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने स्वीकार किया है कि इन तीन बच्चियों की मौत की जिम्मेदार सरकार है। पी. चिदंबरम ने भाजपा सरकार पर आरोप लगाया है कि उन्होंने मनरेगा और खाद्य सुरक्षा कानून की अनदेखी की है। राजधानी दिल्ली में 3 बच्चों की भूख से मौत मानवता को शर्मशार करदेने वाली घटना है। पर केंद्र सरकार क्या आंख मूंदे बैठी है? क्या सरकार भारत को डिजिटल बनाने में इतना खो गयी है कि आम जन उसे दिख ही नही रहे।

अंजली चौहान

Thursday, 26 July 2018

शौर्य स्मृति दिवस: शहीदों को श्रद्धांजलि

   26 जुलाई राष्ट्रीय विजय दिवस के रुप मे प्रति वर्ष मनाया जाता है। भारतीय इतिहास में 26 जुलाई भारतीय सेना की शौर्य गाथा गाती है, क्योंकि लगभग 60 दिनों तक यह युद्ध चला तथा 26 जुलाई को भारतीय सेना ने युद्ध विजय प्राप्त कर इसका अंत किया । यह युद्ध भारत और पाकिस्तान के बीच हुआ , हलांकि भारत - पाक संघर्ष होते रहे हैं और आज भी हो रहे हैं ,पंरतु माना जाता है कि दूसरे विश्व युद्ध के बाद कारगिल युद्ध मे सबसे अधिक बम बारी दुश्मन सेना पर की गई थी जो भारतीय सेना द्वारा पाकिस्तान पर की गई । दोनो देशों के बीच हमेशा से तनाव की स्थिति रहती है, पंरतु इसे शांत करने के लिए कई बैठकें करने का वादा किया जाता है और की भी जाती है समय - समय पर , लेकिन पाकिस्तान अपने सैनिकों एवं अर्धसैनिक बलों को छिपाकर भारतीय सीमा के अंदर भेजनें लगा जिसका उद्देश्य कश्मीर और लद्दाख के बीच की कड़ी को तोड़ना और भारतीय सेना को सियाचिन ग्लेशियर से हटाना था । शुरुआत में यह महज घुसपैठ मात्र लगा पंरतु इसकी खोज के बाद पता चला कि यह नियोजित रणनीति थी जो बड़े पैमानें पर की गई थी। इसकी सूचना मिलने के तुरंत बाद भारत सरकार ने 2,00,000 सैनिकों को युद्ध के लिए भेजा इसे भारतीय सेना ने ऑपरेशन विजय का नाम दिया। जहाँ पाकिस्तान ने कब्जा किया वहाँ बम गिराए गए तथा भारतीय वायुसेना ने मिग-27 और मिग-29 का उपयोग किया । कई पाकिस्तानी ठिकानो पर मिग-29 की सहायता से आर-77 मिसाइलों से हमला किया गया। इस भीषण युद्ध में लगभग 2,50,000 रॉकेट और बम का उपयोग किया गया तथा 5,000 बम फायर करने के लिए 300 से ज्यादा मोर्टार, तोपों का उपयोग किया गया। करीब दो महीनों तक चले इस युद्ध में भारतीय सैनिकों मे 527 से अधिक जवान शहीद हुए, पंरतु भारतीय सेना ने साहस और जांबाजी की ऐसी मिसाल प्रस्तुत की, कि जिस पर हर देशवासी को गर्व महसूस होता है।यह युद्ध 26 जुलाई 1999 को आधिकारिक रूप से समाप्त किया गया।
             

                             अंजली चौहान

Wednesday, 25 July 2018

हारने का दौर

लाख बार!उजाला
सपनों में रौशनी
लालिमा का परचम
बन कर उभरता है
हार भी जीत ऐसे ही बनती है
बस बदलो अपने जीतने की व्याख्या
हारने का तर्जुमा
तुम हर किसी के जीत में
अपनी जीत तलाश लोगे
तुम फिर कठपुतली नहीं
तुम्हारे सामने सब कठपुतली होंगे
और तुम दूर बैठकर
नज़ारा देखोगे,सब समझोगे
असर नहीं होगा बस
बस तुम सीखोगे
सीखते जाओगे
हर जीत से
औरों के हार से भी
यही विचार रखना
तुम अना* से बच जाओगे
हर बार! हर बार
तुम्हारी ही जीत होगी
हारने का दौर भी
तुम्हारी दौड़ में कहीं पीछे छूट जाएगा..

-Saurabh mishra

Tuesday, 24 July 2018

मानसून संसद सत्र 2018


भारत सरकार के द्वारा संसद में  मानसून सत्र की 18 जुलाई 2018 से शुरुआत की गई जो 10 अगस्त 2018 तक अयोजित रहेगा। इस बार के मानसून संसद सत्र 2018 में लोकसभा और राज्यसभा में कुल 18 बिलों कि सूची तैयार की गई है। गृह मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में संसदीय मामलों पर कैबिनेट कमेटी की बैठक की है जिसके बाद उन्होंनें मीडिया को बिल का ब्रीफ दिया है। श्री अंनतकुमार जो कि रसायन एंव उर्वरक और संसदीय मामलों के केंद्रीय मंत्री हैं उनके द्वारा कहा गया है कि सत्र में 18 कार्य दिवस होंगे और सभी राजनीतिक दलों से निवेदन है कि वह इस सत्र को पारित करने में पूरा सहयोग दें। संसद के दोनों सदनों में विचार विमर्श करनें के लिए यह विषय पर चर्चा करेगी जिसमें सरकार संविधान ( एक सौ और बीसवां संशोधन) विधेयक , 2017, मुस्लिम महिलाएं ( विवाह अधिकारों पर संरक्षण ) विधेयक,2017, ट्रांसजेंडर व्यक्तियों ( अधिकारों के संरक्षण) विधेयक 2016, राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग विधेयक ,2017, बच्चों के अधिकार मुक्त और अनिवार्य शिक्षा ( द्वितीय संशोधन) विधेयक ,2017,और अन्य महत्वपूर्ण बिल लाएगी।
 मानसून सत्र में पारित किए जाने के लिए बिलों की सूची :
1- राज्यसभा द्वारा पारित :
     - व्हिस्ल ब्लॉवर्स प्रोटेक्शन(संशोधन) विधेयक,2015
- पिछड़ा वर्ग ( दोहराव) विधेयक, 2017 के लिए राष्ट्रीय आयोग
[ व्हिस्ल ब्लॉवर्स बिल उन आधारों को निर्दिष्ट करता है जिनके तहत भ्रष्टाचार से सम्बंधित खुलासे सार्वजनिक नहीं किए जा सकतें हैं , जबकि पिछड़ा वर्ग ( दोहराव) विधेयक ,2017 के लिए राष्ट्रीय आयोग पिछड़ा वर्ग अधिनियम , 1993 के राष्ट्रीय आयोग को रद्द करने का प्रस्ताव रखता है। )
 2- दोनों सदनों में पारित :
     - भारतीय प्रंबधन  संस्थान ,2017
  - भ्रष्टाचार रोकथाम ( संशोधन) विधेयक,2013
  - नागरिकता ( संशोधन) विधेयक,2016
  - नेशनल स्पोर्ट्स यूनिवर्सिटी बिल ,2017
  -  वित्तीय संकल्प और जमा बीमा ( एफडीआरआई) विधेयक, 2017
   - प्रंबधन विधेयक, 1990 में श्रमिकों की भागीदारी
  - पूर्वोतर परिषद ( संशोधन) विधेयक,2013
 


                               अंजली चौहान

दो शब्द

दो शब्द
एक अहसास की धूरी पर
दिलचस्प तरीके से इस्तेमाल हो
वो कुछ भी हो सकता है
वो हर वियक्ति का
तुम्हारा केवल तुम्हारा भी
या यूँ कहें! किसी का भी नहीं
वरदान या विलाप
या केवल दो शब्द
चुनने का हक
सबको है इन्हें
और कहूँ नहीं तो?
हक भी बड़ा अजीब है
क्योंकि हक 'शब्द' का भी है
उसे कौन कहे
उसे कौन सुने
बेशक ये दो हों,सैकड़ों हों
दो शब्द हों
बस! दो शब्द

-Saurabh Mishra

Monday, 23 July 2018

सवाल



पूछो न
कहो न
क्या??
वही जो
हर कोई
कोई न कोई
कुछ न कुछ
पूछता ही रहता है
कहता ही रहता है
सिलसिला है
तबादला है
पंचायत है
स्कूल है
कॉलेज है
मुल्क है
संसद है
नेता है
अब बताओ
क्या पूछना है
क्या कहना है
वही जो!
कोई न कोई
कुछ न कुछ
पूछता ही रहता है
कहता ही रहता है..

सौरभ मिश्रा

Sunday, 22 July 2018

22 जुलाई : राष्ट्रीय झण्डा अंगीकरण दिवस

    हमारा देश जिस समय ब्रिटिश सरकार की गुलामी से मुक्ति पाने के लिए संघर्ष कर रहा था उसी समय स्वतंत्रता सेनानियों को एक ध्वज की आवश्यकता महसूस हुई ताकि ध्वज स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति का प्रतीक बने ।
1904 में पहली बार ध्वज बनाया गया जो कि विवकानंद की शिष्या सिस्टर निवेदिता ने बनाया था , पंरतु ध्वज का सफर यहीं नहीं थमा इसके बाद समय - समय पर इसमें अलग - अलग लोगों द्वारा परिवर्तन कर नए-नए तरह से ध्वज बनायें गए तथा कठिन संघर्ष के बाद ब्रिटिश सरकार से भारत को आज़ादी मिली तो वह लोकतांत्रिक गणराज्य बना जिसका अपना नया संविधान निर्माण किया गया और एक राष्ट्र के लिए राष्ट्रीय ध्वज को अंगीकृत करने की आवश्यकता पड़ी , जिसके फलस्वरूप आज अर्थात 22 जुलाई 1947 को राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे को भारत के संविधान द्वारा अपनाया(अंगीकृत )गया । तिरंगे के अभिकल्पनाकर्ता पिंगलि वेकय्या हैं और उन्होंने इसकी रुप रेखा कुछ इस प्रकार बनाई है कि तिरंगे में सबसे ऊपर केसरिया रंग , बीच में सफ़ेद और नीचे गहरा हरा रंग बराबर अनुपात में हैं और इसी तीन रंग के कारण इसे तिरंगा कहा जाता हैं । चूंकि यह संविधान द्वारा अंगीकृत है इसलिए इसे राष्ट्रीय ध्वज की उपाधि मिली है। ध्वज जिसे आम बोलचाल की भाषा में झण्डा कहा जाता हैं इस झण्डे की चौड़ाई व लम्बाई 2:3 अनुपात की हैं। सफ़ेद पट्टी के केंद्र में गहरा नीले रंग का चक्र है , जिसे सम्राट अशोक की राजधानी सारनाथ में स्थापित सिंह के शीर्ष फलक के चक्र प्रारुप को झण्डे  में लिया गया हैं। चक्र की परिधि सफ़ेद पट्टी की चौड़ाई के बराबर होती है जिसमें 24 तीलियाँ हैं यह तिंरगा सिर्फ एक ध्वज नहीं अपितु भारत की शान हैं।
                 


                           अंजली चौहान

Friday, 20 July 2018

सलमा सिर्फ नाम नही एक उम्मीद है।

     शीर्षक की यह पक्तियाँ सलमा जी पर सटीक बैठती हैं। सलमा उत्तर प्रदेश के हापुड़ जिले के सलाई गांव की निवासी हैं जिनका मोतियों की माला बनाने का कारोबार है इसमें मोतियों की माला, ब्रेसलेट , इयररिंग, नेकलेस , हेयर बैन्ड आदि शामिल हैं। 55 वर्ष की सलमा का काम करने का जूनुन आज भी वैसा ही है जैसे तब था जब उन्होंने यह काम करने कि शुरुआत की थी हलांकि यह काम उतना आसान नहीं था सलमा एक छोटे से गांव की महिला है जिन्होंनें अपने हस्तशिल्प की कला को पेशे में बदलने का निर्णय किया , पंरतु उनके इस कदम से उन्हें गाँव वालो के ताने, भली - बुरी बातें सुननी पड़ी लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और आज वह गाँव की 100 से ज्यादा महिलाओं के साथ  मोतियों कि माला पिरोने का काम करती हैं।
इससे उन सभी काम करने वाली महिलाओं की आर्थिक तंगी दूर हुई है। सलमा के पति वाहन चालक थे। उनकी तीन बेटियाँ और तीन बेटे हैं जिनकी देखभाल  शिक्षा के लिए पति कि कमाई पूरी नहीं पड़ रही थी और इस समस्या को दूर करने के लिए उन्हें एक परिचित ने मोतियों की माला बनाने के बारे मे बताया । बस यहीं से जीवन के एक नए सफर का आरंभ हुआ । उनके हुनर को आज देश ही नहीं विदेश मे भी पसंद किया जा रहा है नोएडा की एक कंपनी इन महिलाओं द्वारा तैयार किया गया समान लेती है तथा अरब से अमेरिका तक इसके कद्र दानों तक पहुंचाती है । इस तरह प्रति माह सभी की कमाई 10-20 हजार तक हो जाती है।
  सलमा के इस कार्य से उनकी ही नहीं अपितु उन सभी महिलाओं की भी आर्थिक स्थिति बेहतर हुई है जो उनके साथ इस काम से जुड़ी हैं।



                        अंजली चौहान

Thursday, 19 July 2018

मालूम नही(कविता)

मालूम नही
क्यों तुम अपने न होकर भी अपने से लगते हो।
क्यों हर सवाल का जवाब तुम तक ले आता है।
एग्जाम में फेल होने से ज्यादा डर तुम्हारा दूर होना लगता है।
क्यों हर रास्ता तुम्हारे घर से गुजरता है।
क्यों ना चाहते हुए भी इस कविता में सिर्फ तुम हो।
मालूम नहीं
पर इतना मालूम है साथ तुम्हारा चेहरे पे मुस्कान ले आता है।
उन तमाम मुसीबतों का समाधान हो जाता है।

Wednesday, 18 July 2018

प्रेसिडेंट मैडल ऑफ फ़्रीडम:नेल्सन मंडेला

    व्यक्ति की अच्छाई एक ऐसी लौ है, जो छुप तो सकती है पर कभी बुझ नहीं सकती।
  नेल्सन रोलीह्लला मंडेला का यह कथन एक दम उचित है और स्वयं उनके ऊपर यह सही जान पड़ता है, क्योंकि उनकी मृत्यु होने के बाद भी उनकी विचारधारा तथा उनके द्वारा किए गए काम आज भी जीवित हैं।

आज यानी 18 जुलाई 1918 मे म्वेज़ो,केप प्रांत दक्षिण अफ्रीका में इनका जन्म हुआ था आज उनका 100वाँ जन्मदिन है। नेल्सन मंडेला दक्षिण अफ्रीका के प्रथम अश्वेत राष्ट्रपति थे जिन्होंने राष्ट्रपति बनने से पहले दक्षिण अफ्रीका मे सदियों से चले आ रहे रंगभेद का विरोध किया था। वह अफ्रीकी नेशनल कंग्रेस और इसके सशस्त्र गुट [उमखोंतो वे सिजवे ]के अध्यक्ष रहे । रंगभेद का विरोध संघर्ष करने के कारण उन्हें अपने जीवन के 27 साल रॉवेन द्वीप के कारागार में बिताने पड़े जिसके कारण वह दक्षिण अफ्रीका तथा विश्व में रंगभेद का विरोध करने का प्रतीक बन गए। 1990 मे श्वेत सरकार से हुए समझौते के पश्चात उन्होंने नए दक्षिण अफ्रीका का निर्माण किया। नेल्सन मंडेला बहुत हद तक महात्मा गांधी की तरह अंहिसक मार्ग के समर्थक थे , उन्होंने गांधी को प्रेरणा स्त्रोत माना था और उनसें अहिंसा का पाठ सीखा था।
उन्हें लोकतंत्र के प्रथम संस्थापक (राष्ट्रीय मुक्ति दाता और उद्घारकर्ता) के रुप में देखा जाता है। दक्षिण अफ्रीका मे प्रायः उन्हें मदीबा कह कर बुलाया जाता है जो बुजुर्गों के लिए एक सम्मान -सूचक शब्द हैं। 95 वर्ष की उम्र मे 5 दिसंबर 2013 को सक्रंमण होने के कारण उनकी मृत्यु हो गई थी। उनके महान व्यक्तिव के कारण सयुंक्त राष्ट्र संघ ने उनके जन्मदिन को नेल्सन मंडेला अन्तर्राष्ट्रीय दिवस के रुप में मनाने का निर्णय लिया।
                     
                         अंजली चौहान

बाजारवाद की नयी सृजनशीलता

भारत अपनी सृजन करने की कला से प्रसिद्ध है। यहाँ कहानी, कविताएँ, ग़ज़ल, नाटक, लघु कहानियों का सृजन होता है। भारत में प्रेमचन्द, अमृता प्रीतम, मन्नू भंडारी, अज्ञेय, दिनकर, सूरदास, कबीर, तुलसीदास जैसे कई सृजनकारों ने बहुत कुछ सृजित किया। अब भी कहानियाँ, कवितायेँ, नाटक लिखे जाते हैं पर उनने सृजित नही किया जाता बल्कि उनका उत्पादन होता है।
 आज बाज़ारवाद इस कदर हावी हो गया है कि एक नए तरह की सामग्री का सृजन हो रहा है पर क्या इसे सृजन कहेंगे? नही यह उत्पादन की श्रेणी में आएगा क्योंकि हम बाजार के लिए सामग्री का उत्पादन कर रहे हैं। शायद इसीलिए आज का साहित्य पुराने साहित्य की तुलना में 'यूज़ एन्ड थ्रो' बनके रह गया है। कबीर के समय के साहित्य की बात करें या दिनकर के, इन समयों में किसी प्रकार का कोई बाजार हावी नहीं था क्योंकि कोई धन अर्जन के लाभ से साहित्य की रचना नही करता था। पर अब साहित्य कैसा भी हो बाजार में बिकने वाला हो। पर एक बड़ा सवाल है कि क्या यह सर्जनात्मकता को अंत की ओर तो नही धकेल रहा? और अगर ऐसा है तो शायद साहित्य एक उत्पादन बनकर रह जायेगा।

Tuesday, 17 July 2018

नीम का वृक्ष: एक वरदान

 नीम भारत में मूल रुप से पाया जाने वाला वृक्ष है जो की भारतीय पर्यावरण के अनुकूल है और भारत में बहुतायत में पाया जाता है। इसकी औसत लम्बाई 15-20 मीटर , 150-200 वर्ष का जीवन काल होता है। नीम का उपयोग 4000 वर्ष से भी अधिक समय से आयुर्वेद में किया जा रहा है। भले ही इसका स्वाद कड़वा होता है परंतु यह सेहत के लिए लाभकारी है नीम केइस्तेमाल के शारीरिक फायदे तो है ही साथ ही कई धार्मिक मान्यताएं भी इससे जुड़ी है। हिन्दू
मान्यता के अनुसार यह माँ दुर्गा का स्वरूप है जो हर तकलीफ़ को दूर कर देता है कहते है कि देवराज इन्द्र ने जब धरती पर अमृत छिड़का तो इससे नीम के पेड़ का जन्म हुआ और इसमें चमत्कारी गुण आ गए । नीम ऐसा वृक्ष है जिसमें गुणों की खान हैं। ये सबसे ज्यादा ऑक्सीजन देता है तथा रोगाणुओं को खत्म करता है। अगर अपने आंगन या घर के आस -पास नीम को लगाया जाए तो यह पूरे परिवार के लिए डॉक्टर के समान साबित होता है जो खुद आ कर देख - रेख करता है।
 आइए जानें इसके  गुणकारी लाभ -
- नीम की छाल का लेप प्रयोग करने से यह सभी प्रकार के चर्म रोगों व घावों के निवारण मे सहायता प्रदान करता है।
- नीम की दातुन करने से दांत व मसूड़े स्वस्थ्य रहते हैं।
- इसमें भरपूर मात्रा में एंटीऑक्सीडेंटस पाए जाते है जो त्वचा पर उम्र के असर को कम करते है।
- हलाकि नीम की पत्तियां कड़वी होती है परतुं इसे चबाने से रक्त शोधन होता है और त्वचा  विकार नहीं होता।
- इसकी  पत्तियाँ पानी में उबाल उस पानी से नहाने से त्वचा हर प्रकार के संक्रमण से सुरक्षित रहती है।खासतौर से चेचक के समय नहाने से उसके विषाणु फैलने से यह रोकता है।
- नींबोली (नीम का छोटा सा फल ) और उसकी पत्तियों का तेल निकाल उस तेल से मालिश करना शरीर के लिए अच्छा माना जाता है।
- बालों के डैंड्रफ व झड़ते बालों को रोकने के लिए इसकी पत्तियों का लगाने व पानी मे पत्ती डाल कर बाल धोने से इस समस्या से छुटकारा पाया जा सकता है।
- सोते समय दूध में नीम के तेल की कुछ बूंदे डालकर पीए तो ज्यादा पसीना आने तथा जलन होने सम्बन्धी विकारो से निजात मिलता है।
- कपडों मे नीम की पत्तियाँ व तेल की गोलियां रखने से कपडें नमी से खराब नहीं होतें ।
- अनाज मे नीम के पत्ते रखने से कीड़े नहीं लगते ।
 नीम के इतने सारे फायदे होने के कारण इसे अमृत तुल्य माना जाता है।
                   

                            अंजली चौहान

Monday, 16 July 2018

इंजीनियर की नौकरी छोड़ बनी गरीब बच्चों की टीचर:शैली तोमर

        वर्तमान समय में जहाँ युवा उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद किसी बडें पद की नौकरी का सपना देखते हैं तथा उसे पूरा करने का हर सभंव प्रयास करते हैं, तो वहीं एक ऐसी शक्शियत है जिन्होंने अपनी नौकरी छोड़ स्लम बच्चों को पढ़ाने का निर्णय किया है और वो शक्शियत शैली तोमर हैं जो
एमसीए करने के बाद निजी कम्पनी में साफ्टवेयर इन्जिनियर की नौकरी करती थीं।पर जब भी वह झुग्गी- बस्ती, टैफिक सिगनल्स, मन्दिर के बाहर या और जगह बच्च्चों को भीख मांगते हुए देखती थी तो उन्हें बहुत बुरा महसूस होता था। शैली से यह देखा नहीं जाता था कि बच्चों के हाथ किताबों की जगह कटोरे है, उन्होंने सोचा की अगर वह इन वचिंत बच्चों के हाथों से भीख का कटोरा हटा कर किताबें थमा दे तो कितना अच्छा हो । इस विचार को काफी समय. तक सोचने के बाद उन्होंने नौकरी छोड़ दी तथा बच्चों को पढ़ाने लगी। परन्तु यह कार्य उतना असान नहीं था। उन्हें शुरुआत में बहुत मुश्किलों का सामना करना पड़ा उनकी नौ माह की बेटी है जिसकी देखभाल करने के बाद जो भी समय बचता वह उस समय गरीब बच्चों को पढ़ाने जाती लेकिन जब वह झुग्गी - बस्ती मे गई तो कोई पढ़ने के लिए तैयार नहीं हुआ उनके लिए पहली चुनौती यह रही कि उन्हें बच्चों व उनके अभिभावकों को तैयार करना पड़ा और वह.इस काम मे सफल भी रही,आज जब वह पढ़ाने जाती हैं तो बच्चे पहले से किताबें लिए तैयार रहते है। शैली दिल्ली के दिलशाद गार्डन की निवासी हैं तथा वह दिल्ली के निज़ामुद्दीन बस्ती, शकूर बस्ती सहित कई दूसरी बस्तियों में हफ्तें के दो दिन पढ़ाने जाती हैंं।इस काम को करते हुए उन्हें दो साल का समय हो गया है और जो बच्चे अपना नाम तक नहीं लिख पाते थे वह आज किताबें पढ़ते हैं कविता, कहानियां लिखा करते हैैं ऐसे बच्चों को पढ़ाने के लिए उन्होंने पुरानी किताबों का प्रबंध कर रखा है।उन्हें जो सन्तुष्टि नौकरी मे नहीं मिली वो इन बच्चों को पढ़ाने से मिलती है।शैली का ऐसा कार्य समाज के लिए प्रेरणा है तथा ये देश तभी विकास कर सकता है जब सभी वर्ग शिक्षित हों। आर्थिक तन्गी के वजह से आज भी बहुत बच्चे शिक्षा से दूर हैं इन्हें शिक्षित करने मे जितना हम सभी कोशिश करें उतना बेहतर होगा, अन्यथा देश के सर्वांगीण विकास की मात्र कल्पना की जा सकती है वास्तविकता मे नहीं बदला जा सकता।

अंजली चौहान

भारत के बड़े नोट नेपाल में अवैध: इंडो-नेपाल मित्रता खतरे में

2016 में हुए विमुद्रीकरण के कारण भारत के विदेशी संबंध पहले ही खराब होते दिखायी दिए थे। नोटबंदी से रातों रात 500 और 1000 के नोट अवैध कर दिए ...